अनारकली नहीं थी अकबर और सलीम के बीच की दुश्मनी की वजह

हम सुनाते हैं उस तारीख से जुड़ी भारत की ऐतिहासिक कहानियां। आज 12 अगस्त और आज की तारीख का संबंध है। एक हत्या किसकी हत्या। अबुल फजल इब्न मुबारक। कौन थे अबुल फजल अकबर के दरबार के नवरत्नों में से एक थे आईने अकबरी और अकबर नामा इन्होंने लिखा था। अबुल फजल को भारतीय इतिहास के महान लेखकों में से एक माना जाता है। 15 साल की उम्र में उन्होंने उस समय मौजूद फिलॉसफी यानि दर्शनशास्त्र की कम वे सारी किताबें पढ़ डाली थीं। ऐसा कहा जाता है उनकी तेज बुद्धि को लेकर एक किस्सा फेमस है जिसका जिक्र खुद अबुल फजल ने अपने में किया जब वो 20 साल के थे तो उन्हें किताब मिली।

किताब बहुत पुरानी थी और उसके आधे से ज्यादा पन्ने दीमक खा गए थे। किसी से की शुरुआत अच्छी तो किसी हिस्से का अंत गायब था। सबल फजल ने खराब हुए पन्नों के साथ कुछ सादे कागज जोड़ दिए आधारित होने लगा दिए। इसके बाद अपनी समझ से हर लाइन को पूरा करने की कोशिश की और इस तरह किताब को पूरा कर दिया। आगे जाकर जब इस किताब की दूसरी कॉपी मिली जो साबूत थी तो अबुल फजल की कॉपी से उसका मिलान किया गया सिवाय दो तीन शब्दों के। दोनों किताबें हूबहू थीं। अपनी हाजिर जवाबी और योग्यता के कारण अबुल फजल अकबर के सबसे खास बन गए थे। वो सूफी विचारधारा में विश्वास रखते थे और कट्टर मौलवियों से बहस करने में बाचा की मदद किया करते थे इसलिए उनके खिलाफ काफी दुष्प्रचार भी किया गया

कहा गया कि वो काफिर हैं और इस्लाम को नहीं मानते। पॉप कल्चर में माना जाता है कि शहज़ादे सलीम और अकबर के बीच दुश्मनी का कारण अनारकली थी लेकिन अनारकली का किस्सा केवल सुनी सुनाई बात। ऐसा कई लोगों का मत है। असल में दुश्मनी की एक बड़ी वजह था अबुल फजल। अकबर के अपने बेटे सलीम से संबंध बहुत अच्छे नहीं थे हम जानते हैं ऐसे में अबुल फजल की बादशाह से निकटता देख वो दुश्मनी की नजरों से उन्हें देखा करता था। वो हमेशा इसी कोशिश में लगा रहता था कि किस तरह बादशाह और अबुल फजल के रिश्तों में दरार पैदा हो। ऐसे में एक दिन शहजादा सलीम अबुल फजल के घर पहुंचा। उसने देखा कि वहां कुछ लेखक कुरान और उसकी व्याख्याओं की नकल बना रहे थे। बना रहे थे वो इन सब लोगों को बटोर कर अकबर के पास ले गया और उसने कहा कि दरबार में कुरान में लिखी कई बातों की खिलाफत करता है और अकेले में कुरान की आयतें लिखवाता है। अबुल फजल का नाम लगाके था। अकबर ने उन दिनों दीन ए इलाही नाम का पंथ चलाया हुआ था जिसमें सभी धर्मों की शिक्षाओं को जोड़ा गया था। उसे अबुल फजल की आयतें छपवाने वाली बात से अचरज तो हुआ लेकिन वो अबुल फजल की नीयत से वाकिफ था इसीलिए उसने अबुल फजल से कुछ कहा नहीं। इसके बाद सलीम ने कई कोशिशें कीं जिसके बावजूद अबुल फजल अकबर का खास बना रहा। अब सवाल के अबुल फजल की हत्या किसने की और उससे ज्यादा जरूरी क्यों की हत्या किसने की इसका जवाब है वीर सिंह बुन्देला। लेकिन सिंह बुन्देला कौन था उसने अबुल फजल की हत्या क्यों की इसे समझने के लिए हमें ओरछा चलना होगा। आज के हिसाब से ओरछा मध्य प्रदेश में ग्वालियर से 123 किलोमीटर दूर पड़ता है। उसके बगल से ही बेतवा नदी बहती है। झांसी के में जिनकी तैनाती होती है वो लोग अमूमन घूमने ओरछा जाते हैं। वापस लौटते हिस्से पर ओरछा बुंदेलखंड में राजपूतों की राजधानी हुआ करती थी। 15 सौ बयान में इसका शासक हुआ करता था मधुकर शाह जिसकी मौत के बाद राम शाह ने उसकी गद्दी संभाली। ये सब अकबर की छत्रछाया में हो रहा था। अकबर को संपूर्ण भारत का सम्राट मान लेने के बाद राम शाह को और किसी का डर नहीं था

लेकिन उसका अपना भाई वीरसिंह इससे सहमत नहीं था। वो खुद को ओरछा की गद्दी का असली वारिस समझता था और नतीजतन उसने विद्रोह किया। अब इस वीर सिंह से जंग के लिए अकबर ने मुगल सेना को तीन बार राम शाह की मदद के लिए भेजा क्योंकि वो राइट कुकिंग ज्यादा के हिसाब से जंग हार जाने की हालत में वीर सिंह हर बार बच कर निकल जाता था तो उसे समझ आया कि मुगलों से अकेले लोहा लेना मुश्किल है संभव नहीं। उसे मदद की जरूरत थी और हाथ कंगन को आरसी क्या मिला हाजिर हो गए कहां से खुद मुगलों से कैसे ये समझते हैं अभी तो हमने आपको पहले बताया कि अबुल फजल की अकबर से बढ़ती निकटता को देखते हुए सलीम बहुत पसंद नहीं करता था साथ ठहरता था सन 16 सौ में उसने आगरे की सल्तनत से विद्रोह कर दिया और इलाहाबाद जाने आज के प्रयागराज में अपना दरबार लगा दिया। यहां तक कि अपनी अलग मुद्रा भी चलवाई। अकबर ने उसे मनाने की बहुत कोशिश की लेकिन सलीम था कि मानता नहीं था। ऐसे में मौका देख भीमसेन ने सलीम से हाथ मिलाया लेकिन जैसा कि तारीखे औरंगजेब वाले एपिसोड में हमने आपको बताया था मुगल सल्तनत को लेकर उन दिनों एक कहावत चलते थे। तख्त हासिल करो या ताबूत में जाओ। सलीम को किसी भी हाल में तक चाहिए था और इस खेल में वीरसिंह सलीम के लिए ताकतवर मोहरा साबित हो सकता था। इन्हीं दिनों अकबर दक्कन के मामलों में उलझा हुआ था। बहुत सारे मुगल दखल के मामलों में उलझे रहे। अहमदनगर के निजाम शाही और मुगलों में जंग चल रही थी। सूरसदन में अकबर ने अपने सबसे भरोसेमंद सिपहसालार अबुल फजल को दक्खिन के मसलों का निपटारा करने के लिए भेजा। साथ ही उसे यह हिदायत मिली की वापसी में इलहाबाद होते हुए आना सलीम से मिलना और उसे मनाना अबुल फजल के लिए। के खाए खराब हो कर सो वो बादशाह की इच्छा पूरी करने के लिए दक्खिन गए दक्खिन की घटना में उनकी वफादारी की एक झलक भी मिलती है। वही उनकी दक्खिन की तरफ जाते हुए जब वो बुरहानपुर पहुंचे तो उनकी मुलाकात खानदेश के अध्यक्ष बाहर दो खान से हुई और अध्यक्ष मतलब इंचार्ज जिनके हाथ में पूरा सूबा था। खान देखने नर्मदा और ताप्ती के बीच वाला इलाका अबुल फजल की बहन के शादी बाद वहां के भाई से हुई थी। इसी के बाद दुखाने अबुल फजल को अपने घर आने का न्योता दिया ताकि वो उनकी खातिरदारी कर सकें। अबुल फजल ने उनसे कहा कि अगर वो बाचा के काम में मदद करें तो वो जरूर उनके घर चलेंगे। तब बादशाह खान ने उन्हें कुछ तोहफे और रुपए भिजवाए। अबुल फजल ने उन्हें मिलने से इनकार किया और जवाब भिजवाया कि जब तक चार शर्ते पूरी नहीं होंगी तब तक वो कोई उपहार स्वीकार नहीं करेंगे। पहली शर्त ये कि उपहार देने वाले के साथ प्रेम का संबंध होना चाहिए। दूसरी शर्त थी कि उपहार देने वाले का उनके ऊपर कोई ऋण नहीं होगा मैं कर्ज़ में नहीं आऊंगा उपहार लेकिन तीसरी की वो उपहार उन्होंने खुद मांगा हो और चौथी के उपहार में मिलने वाली वस्तु की उन्हें जरूरत ना हो। इसके आगे अबुल फजल ने बाबू खां उनसे कहा कि पहले तीन शर्तें पूरी हो रही हैं लेकिन चौथी शर्त पूरी नहीं हो सकती क्योंकि बादशाह अकबर की कृपा से उन्हें ऐसी किसी चीज की कमी महसूस होती नहीं है। इस किस्से से पता चलता है कि सलीम की सारी कोशिशों के बावजूद अबुल फजल अकबर का के कितने वफादार थे। अबुल फजल की दरियादिली के किस्से मशहूर हैं। कहते हैं कि दक्खिन के चढ़ाई के समय रोज अबुल फजल के लिए मखमल बिकता था जिसमें हजारों थाली में भोजन आता और अफसरों में बढ़ता उनके खानसामे कोई निर्देश था कि शिविर के बाहर हमेशा एक 9 बजे लगे रहे जिसमें दिन रात सबको पकी पकाई खिचड़ी बांटते रहे।

खैर कैसे वो आगे बढ़ते दक्कन से काम निपटाकर अबुल फजल लालबाग की तरफ बढ़ते चले तो सोचने लगे कि किसी प्रकार सलीम को मनाया जा क्या उसकी युक्ति हो। महिला बाद में सलीम अबुल फजल को रास्ते से हटाने की तरकीब भिड़ा रहा था। इस काम के लिए उसने वीर सिंह को सबसे सही आदमी माना। उसने वीर सिंह से कहा कि एक हाथ से एक हाथ दो यानि सलीम उसकी मदद करेगा लेकिन पहले उसे सलीम का काम करना होगा। इसके बाद उसने से कहा कि अगर वह अबुल फजल का सर काटकर ले आए तो वो उसे ओरछा का राजा बना दे। एक बहादुर योद्धा थोड़े बहुत समझ भी उसमें थी उस सलीम को समझाने की कोशिश की कि अबुल फजल से उसका रिश्ता एक मालिक और मुलाजिम का है इसलिए वो अबुल फजल को माफ करते। लेकिन सलीम माना नहीं वीर की मजबूरी थी। सलीम की बात मानने के अलावा उसके पास कोई चारा था। उधर अबुल फजल को रास्ते में के मंसूबों का पता चल गया लेकिन वो सिंह को छोटा मोटा लुटेरा समझते रहे अनबर नामा में उन्होंने शेर सिंह को एक डाकू की संज्ञा दी है।

के इरादे जानकर अबुल फजल के साथियों ने उन्हें चेताया राय दी कि मालवा में चानन घाटी के रास्ते जाना चाहिए। इस पर अबुल फजल ने कहा कि डाकुओं की क्या मजाल है कि मेरा रास्ता रोके क्योंकि वो हैं उनको कौन रोकेगा ऐसा उनका कहना था। दक्कन से लौटते हुए अबुल फजल नरवर में रुके महाबीर सिंह ने एक छोटी टुकड़ी के साथ उन पर हमला कर दिया और आज के दिन यानि 12 अगस्त 16 से 2 को इस हमले में अबुल फजल की मौत हो गई। अबुल फजल अकबर के चहेते सलाहकार थे। मुसीबत के वक्त उन्होंने कई बार अकबर की मदद की थी। इसीलिए सवाल खड़ा हुआ कि उनकी मौत की खबर अकबर को देखा तो उन दिनों एक नियम हुआ करता था कि अगर किसी अजीज की मौत हो जाए तो बाचा को सिद्ध नहीं बताया जाता था। दरबार का वकील हाथ में नीला रुमाल बांधकर बाचा के पास जाता था और झुककर सलाम करता था। इस वाक्या को पता चल जाता था कि किसी अजीज की मौत हो गई है। अबुल फजल की मौत पर भी यही नियम बरता गया। अबुल फजल की मौत की खबर सुनकर अकबर को बहुत दुख हुआ वो बोले यदि शहजादा बादशाह चाहता था तो उसे मुझे मारना चाहिए था ना कि अबुल फजल को यकायक उसके मुंह से शेर निकला जिसका मजमून कुछ इस प्रकार बताया जाता है। जब से हमारी ओर बड़े आग्रह से आया तब हमारे पैर चूमने की इच्छा को बिना सिर पैर किया है। आशय यह था कि मूल अफजल का सिर कटा हुआ था पर इस हालत में उन्हें अकबर के सामने पेश होना पड़ा। इसके तीन साल बाद अक्टूबर 16 से पास में अकबर के लिए मृत्यु हुई थी। अकबर के नवरत्नों में से 6 की मृत्यु उसके पहले ही हो चुकी थी जिसमें बीरबल थे राजा टोडरमल थे तानसेन। अबुल फजल का भाई फाईसी भी शामिल था। केवल दो रत्न ऐसे थे जो अकबर की मृत्यु के बाद तक जीवित रह गए थे। रहीम दास और राजा मानसिंह।

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